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Pandit Deendayal Upadhyaya

             पण्डित दीनदयाल उपाध्याय

                    भारतीय समाज में देदीप्यमान नक्षत्र पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म 2.5 सितम्बर 1916 ई० को श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा जिले के फरह कस्बे के पास नगला चन्द्रभान नामक गाँव में हुआ था, जो अब दीनदयाल धाम के नाम से प्रसिद्ध है । इनके पिता जी का नाम श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय व माता का नाम श्रीमती रामप्यारी था।


                अल्पावस्था में ही बालक दीनू (पण्डित दीनदयाल उपाध्याय) माता-पिता के सुख से वंचित हो गये। एक ओर माता-पिता की मृत्यु से उपजा दारुण दु:ख और दूसरी ओर आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण दीन का प्रारम्भिक जीवन सर्वत्र
अभावों का बना रहा। इसके बावजूद वे असीम धेर्य और लगनपूर्वक विद्यार्जन में जुट गये। इन्होंने सभी कक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं।
                 वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक भी रहे। 21 अक्तूबर 1951 ई० को डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। आप 1952 ई० से 1967 ई० तक भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय महामंत्री रहे। इन्होंने पार्टी की आर्थिक नीति भी प्रतिपादित की। आप लेखक ही नहीं उच्च कोटि के पत्रकार भी थे। आपने पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, स्वदेश जैसे मासिक,साप्ताहिक व दैनिक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन व प्रकाशन किया तथा जगद्गुरु शंकराचार्य, एकात्म-मानववाद,
चन्द्रगुप्त और चाणक्य नामक पुस्तकों की रचना की।
            उनके नेतृत्व में अनेक राष्ट्रवादी आंदोलन चले। फलस्वरूप जनसंघ एक प्रखर राजनीतिक दल क रूप में सारे विश्व में जाना जाने लगा। सादा जीवन व सत्य बोलना उनको विशेषता थी। रेल की प्रथम श्रेणी में कुछ स्टेशनों के मध्य परम पूज्य श्री गुरु जी के साथ यात्रा की तो तृतीय श्रेणी और प्रथम श्रेणी के किराये का अन्तर स्वयं जाकर जमा किया।
         पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अनेक देशों की यात्राएं भी कीं। सभी जगह इस महान चिन्तक के पाण्डित्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी। एक
फ्रेंच पत्रकार ने तो कहा है, "इनका सम्पूर्ण शरीर ही मस्तिष्क है।"
                  दिसम्बर 1967 ई० में दीनदयाल जी भारतीय जनसंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इस कर्मयोगी, मनीषी व राष्ट्रवादी की
उत्कृष्ट महानता को सम्भवत: अराष्ट्रीय लोग सहन नहीं कर सके। फलस्वरूप 11 फरवरी 1968 ई० की कालरात्रि में इस भारतीय सपूत की जीवन ज्योति
को मुगल सराय के निकट रेलगाड़ी में असमय ही बुझा दिया गया।

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