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RANI GAIDINLIU

                   रानी माँ गाईदिन्लियु

                 नागालैण्ड की रानी माँ गाईदिन्लियु के नाम से प्रसिद्ध रानी गाईदिन्लियु का जन्म 26 जनवरी 1915 ई० को मणिपुर के ल्वांगकाऊ ग्राम में रोंगमेई जाति के पुरोहित परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम लोथोनांग एवं माता का नाम कलोत्लेन्लियु था। 
  

         नागाभाषा में गाईदिन्लियु का अर्थ होता है कि
"अच्छा मार्ग दिखाने वाली।" 15 वर्ष की आयु में रानी गाईदिन्लियु ने पड़ोसी ग्राम के मुहबोले भाई जादोनांग के साथ मिलकर अंग्रेजों के ईसाइयत
के प्रचार के विरुद्ध तथा स्वाधीनता के लिये प्रखर आन्दोलन छोडा, रानी के आन्दोलन से अंग्रेज़ सत्ता घबरा गयी थी। फलस्वरूप आन्दोलन को कुचलने
का प्रयास सत्ता द्वारा किया गया| किन्तु रानी को पकड़ पाना बहुत ही कठिन साबित हुआ।
              17 अक्तूबर 1932 को अन्तत: अंग्रेज़ों की असम रायफल रानी गाईदिन्लियु को गिरफ्तार करने
सफल हुई। इम्फाल न्यायालय  में मुकद्दमा चला तथा रानी माँ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। युवावस्था के 14 वर्ष रानी माँ ने पूर्वोत्तर की जेलों में व्यतीत किये। सन् 1947 में आजादी
के बाद उन्हें जेल से मुक्त किया गया।
               फिर वे नागालैण्ड में कोहिमा में ही रहने लगी। नागा समाज के हितार्थ उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की। उन्हीं के सहयोग से हॉफलाँग में विद्या भारती एवं विश्व हिन्दू परिषद् का विद्या मंदिर एवं छात्रावास स्थापित किया गया|                  रानी माँ गाईदिन्लियु 1972 में स्वाधीनता की रजत जयन्ती पर ताम्रपत्र द्वारा सम्मानित होने वाली नागालैण्ड की एकमात्र महिला स्वातन्त्रय योद्धा थी। देशभक्ति एवं जनजातीय स्वाभिमान की प्रतीक रानी माँ गाईदिन्लियु का निधन 1993 को हुआ।

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