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veer Banda Singh bahadur

         वीर बंदा बैरागी सिंह बहादुर


              वीर बंदा सिंह बहादुर का जन्म17 अक्तुबर सन् 1670 ई. (कार्तिक शुक्ल संवत 1727 ) को कश्मीर के पूंछ जनपद के राजौरी नामक स्थान पर हुआ था। इनका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव धा। 



           इनके पिता का नाम रामदेव था। लक्ष्मण देव बचपन के ही बहुत साहसी और बीर भे। शिकार खेलना उनको प्रिय लगता था। एक दिन हिरण का शिकार करते समय युवा लक्ष्मण देव के मन में अचानक करुणा जाग्रत हो उठी। उन्होंने उसी क्षण तलवार और घनुषवाण को त्याग कर संन्यास ले लिया और तपस्था करने के लिए हिमालय की उपत्यकाओं में जा बसे। वहाँ उनकी भेंट वैरागी
साधू जानकौदास जी से हुई जिसने इन्हें माधोदास नाम देकर ईश्वर भक्ति करने के
लिए प्रेरित किया।
             इसी समय पंजाब में गुरुनानक देव जी की गद्दी पर दशम गुरु के रूप में गुरु गोविन्द राय विराजमान हुए और उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सन् 1699 ई. में खालसा पथ की स्थापना कर शास्त्र तेज को शस्त्र तेज से जोड़ दिया तथा
स्थान-स्थान पर खालसा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए ।
                       गुरु गोविन्द सिंह जी की नांदेड में माधोदास से भेंट हुई । गुरु गोविन्द सिंह ने जब देश में मुगलों के अत्याचार और हिन्दुओं की दुर्दशा का वर्णन किया तो माधोदास का क्षात्र तेज जाग उठा और उन्होंने हिन्दुओं की रक्षा के लिए पुन: हथियार
उता लिए। गुरु गोविन्द सिंह ने उन्हें पंजाब जाकर हिन्दुओं की रक्षा के लिए प्रेरित किया और पाँच खालसा सिख और पाँच बाण युद्ध के लिए भेंट किए। माधोदास अब गुरु का बंदा हो गया| बैरागी तो वह था ही। इस प्रकार अब वह बन्दा बैरागी बन गए।
तत्पश्चात शस्त्र हाथ में लेकर मुगलों से संघर्ष प्रारम्भ किया सबसे पहले उसने हरियाणा प्रांत के समाना दुर्ग को जीता और गुरु गोविन्द सिंह को धोखा देकर सिरसा में उन पर आक्रमण करने वाले हसन अली पठान का वध किया। 
              अपने पराक्रम से वह बन्दा सिंह बहादुर बन गए। सरहिन्द के नवाब ने अपने दो सेनानायकों को पाँच हेजार सेना देकर रोपड में बन्दा बैरागी का सामना करने भेजा। इस युद्ध में वीर बन्दा सिंह बहादुर ने पूरी सेना को धूल चटा कर दोनों सेनानायकों का वध कर दिया। इससे उनकी क्षमता बहुत अधिक बढ़ गई और उसने सरहिन्द दुर्ग पर आक्रमण करके गुरु पुत्रों के बलिदान का बदला ले लिया।
                दिल्ली की गद्दी पर फरुखसियर शासक बना। फरुखसियर अपने सेनापति नदखा के साथ गुरदासपुर की ओर बढ़ा और उसने दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया। में खाने-पीने की सामग्री खत्म होते ही दुर्ग का द्वार खोलने के अलावा और कोई
ने रहा फलतः सवत् 1776 में स्वयं बंदा सिंह बहादुर ने दुर्ग के द्वार खोलकर अपने धनुष बाण नीचे रखकर मुगलों को बुलाकर स्वयं अपने को गिरफ्तार कराया।
            एक लोहे के पिंजरे में बंदी बनाकर अब्दुल समन्दखाँ बंदा सिंह बहादुर को लेकर दिल्ली की ओर चल पडा। लाल किले में फरुखसियर ने उनसे इस्लाम स्वीकार करने पर जीवनदान देने के लिए कहा तो बंदा सिंह बहादुर ने उसके मुँह पर थूक दिया
और किसी भी स्थिति में इस्लाम स्वीकार नहीं करने की हुँकार भरी। 
                  बौखलाये हुए फरुखसियर ने जल्लाद से कहा कि इसके जिस्म से माँस की बोटी-बोटी नौच ली जावे और जल्लाद ने सलाख गरम कर वीर बंदा सिंह बहादुर के जिस्म को जला जला कर उसके शरीर का पूरा माँस गला दिया और अंत में उसके पिंजर को हाथी के पांव से बांधकर उसे दौड़ाया गया और इस प्रकार भारत माता के इस सपूत का शरीर माता की गोद में बिखर गया।

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